राजस्थान की जनजातियों की सामाजिक मान्यताएं
Author(s): Raju Nain
Publication #: 2608002
Date of Publication: 05.05.2025
Country: India
Pages: 1-7
Published In: Volume 11 Issue 3 May-2025
DOI: https://doi.org/10.62970/IJIRCT.v11.i3.2608002
Abstract
राजस्थान की प्रमुख जनजातियों (मीणा, भील, सहरिया) में प्रकृति प्रेम, संयुक्त परिवार, और अनोखी विवाह व न्याय प्रणालियाँ उनकी अनूठी सामाजिक पहचान हैं। [1]सामाजिक संगठन और पंचायत व्यवस्था-गामेती और मुखिया: भील समाज के गाँव के मुखिया को 'गामेती' कहा जाता है, जबकि सहरिया जनजाति में पंचायत व्यवस्था तीन स्तरों—पंचताई, एकादसिया और चौरासी में बंटी होती है। [1, 2]गोत्र व नाता प्रथा: इन समाजों में गोत्र बाहर विवाह (गोत्र-बहिर्विवाह) का नियम होता है। कई जनजातियों में आपसी सहमति से संबंध बदलने या 'नाता प्रथा' जैसी सामाजिक मान्यताएँ आज भी मान्य हैं। [1, 2]छेड़ा फाड़ना: भील जनजाति में तलाक की एक सामाजिक परंपरा है जिसे 'छेड़ा फाड़ना' कहा जाता है।
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