बदलती जलवायु में खाद्य सुरक्षा की चुनौतियां

Author(s): रविंद्र कुमार मीना

Publication #: 2604042

Date of Publication: 12.01.2021

Country: India

Pages: 1-4

Published In: Volume 7 Issue 1 January-2021

Abstract

बदलती जलवायु खाद्य सुरक्षा की चार स्तंभों—उपलब्धता, पहुंच, उपयोग और स्थिरता—को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, चरम मौसमी घटनाएं (सूखा, बाढ़, लू) और कार्बन डाइऑक्साइड के उच्च स्तर फसल उत्पादकता, पोषण गुणवत्ता और ग्रामीण आजीविका को कमजोर कर रहे हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां लगभग 55-60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, जलवायु परिवर्तन 2050 तक चावल की पैदावार में 20 प्रतिशत और गेहूं में लगभग 19 प्रतिशत की कमी ला सकता है।

यह शोध पत्र जलवायु परिवर्तन के कारणों, खाद्य सुरक्षा पर इसके बहुआयामी प्रभावों, भारत में क्षेत्रीय केस अध्ययनों, पोषण सुरक्षा पर असर और अनुकूलन व शमन रणनीतियों का विश्लेषण करता है। अध्ययन से स्पष्ट है कि वर्षा आधारित कृषि क्षेत्र सबसे अधिक संवेदनशील हैं। सतत समाधानों जैसे जलवायु सहिष्णु फसलें, कुशल जल प्रबंधन, जैविक कृषि और नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं।

मुख्य शब्द: जलवायु परिवर्तन, खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादकता, शुष्कता, अनुकूलन, भारत।

1. परिचय:

खाद्य सुरक्षा तब सुनिश्चित होती है जब सभी लोगों को हर समय पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध हो जो उनकी आहार संबंधी जरूरतों और खाद्य प्राथमिकताओं को पूरा करे। जलवायु परिवर्तन इस सुरक्षा को बड़ी चुनौती दे रहा है।

भारत में स्थिति और गंभीर है। देश की जनसंख्या 1.4 अरब से अधिक है और 2050 तक खाद्यान्न की मांग में भारी वृद्धि होने की संभावना है। कृषि क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15-18 प्रतिशत योगदान देता है और करोड़ों किसानों की आजीविका का आधार है। लेकिन बढ़ते तापमान, बदलते मानसून पैटर्न और चरम घटनाओं से उत्पादन अस्थिर हो रहा है।

यह पत्र खाद्य सुरक्षा के चार स्तंभों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण करता है, भारत के संदर्भ में केस अध्ययन प्रस्तुत करता है और सतत समाधान सुझाता है।

शोध के उद्देश्य (Objectives of the Research)

1. जलवायु परिवर्तन के कारकों का विश्लेषण: स्थानीय और वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन (तापमान वृद्धि, वर्षा की अनिश्चितता) के प्रमुख कारकों की पहचान करना।

2. कृषि उत्पादकता पर प्रभाव का अध्ययन: बदलती जलवायु के कारण प्रमुख फसलों (गेहूं, चावल, मक्का) की पैदावार पर पड़ने वाले सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का आकलन करना।

3. खाद्य उपलब्धता और पहुंच की चुनौतियों को समझना: बदलती परिस्थितियों में खाद्य सामग्री की आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) और गरीब वर्ग के लिए इसकी पहुंच की चुनौतियों का विश्लेषण करना।

4. अनुकूलन रणनीतियों (Adaptation Strategies) का मूल्यांकन: जलवायु-सहिष्णु (Climate Resilient) कृषि पद्धतियों और नई तकनीकों के प्रभाव का अध्ययन करना।

5. नीतिगत सुझाव देना: खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार और संस्थाओं के लिए प्रभावी सुझाव प्रस्तुत करना।

2. जलवायु परिवर्तन के कारण और वैश्विक-भारतीय परिदृश्य

जलवायु परिवर्तन मुख्यतः मानवीय गतिविधियों—जीवाश्म ईंधन दहन, वनों की कटाई और औद्योगिक उत्सर्जन—से प्रेरित है। भारत में तापमान वृद्धि, मानसून की अनियमितता, सूखे और बाढ़ की घटनाओं में वृद्धि देखी जा रही है। देश के 67 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा आधारित हैं, जहां 84 प्रतिशत ग्रामीण आबादी रहती है। इससे छोटे और सीमांत किसान सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

3. खाद्य सुरक्षा पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

3.1 खाद्य उपलब्धता पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन फसल उत्पादकता को सीधे प्रभावित करता है। तापमान वृद्धि से गेहूं, चावल और मक्का जैसी फसलों की पैदावार कम होती है। अनियमित वर्षा सूखा और बाढ़ लाकर फसल चक्र बिगाड़ती है। उच्च कार्बन डाइऑक्साइड स्तर प्रारंभ में उत्पादकता बढ़ा सकता है, लेकिन पोषण गुणवत्ता (प्रोटीन, जिंक, आयरन) कम करता है।

3.2 खाद्य पहुंच पर प्रभाव

उत्पादन में कमी से कीमतें बढ़ती हैं, जो गरीबों की पहुंच सीमित करती है। चरम घटनाएं आपूर्ति श्रृंखला बाधित करती हैं।

3.3 खाद्य उपयोग पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन पोषण गुणवत्ता कम करता है और जलजनित रोग बढ़ाता है, जो भोजन के पोषण उपयोग को प्रभावित करते हैं। कुपोषण बढ़ता है, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में।

3.4 स्थिरता पर प्रभाव

चरम मौसम घटनाएं आपूर्ति की स्थिरता भंग करती हैं। कीट-रोगों का प्रसार बढ़ता है और जैव विविधता ह्रास होता है।

4. साहित्य समीक्षा (Review of Literature)

इस विषय पर विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों ने व्यापक शोध किया है। कुछ प्रमुख संदर्भ यहाँ दिए गए हैं:

1. वैश्विक परिप्रेक्ष्य और उत्पादन पर प्रभाव

• IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change) रिपोर्ट: IPCC की विभिन्न रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी गई है कि तापमान में 1.5°C से 2°c की वृद्धि वैश्विक अनाज उत्पादन में 10% से 25% तक की कमी ला सकती है।

• रोज़नज़वेग और पैरी (1994): इनके ऐतिहासिक शोध के अनुसार, जलवायु परिवर्तन का सबसे बुरा प्रभाव विकासशील देशों पर पड़ेगा, जिससे वैश्विक खाद्य वितरण में असमानता बढ़ेगी।

2. भारतीय कृषि और वर्षा की अनिश्चितता

• स्वामीनाथन, एम. एस. (2010): भारतीय हरित क्रांति के जनक ने अपने लेखों में 'सदाबहार क्रांति' (Evergreen Revolution) पर जोर दिया है। उन्होंने बताया है कि मानसून की अनिश्चितता और समुद्र के बढ़ते जल स्तर के कारण तटीय क्षेत्रों में धान की खेती को गंभीर खतरा है।

• मल्ल एवं अन्य (2006): इनके अध्ययन के अनुसार, भारत में तापमान बढ़ने से रबी की फसलों (विशेषकर गेहूं) की परिपक्वता अवधि कम हो रही है, जिससे दाने छोटे रह जाते हैं और उत्पादकता घट जाती है।

3. आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां

• खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) रिपोर्ट: FAO के अनुसार, जलवायु परिवर्तन केवल उत्पादन को ही नहीं, बल्कि भोजन की पोषक गुणवत्ता को भी प्रभावित कर रहा है। वायुमंडल में की अधिक मात्रा से फसलों में जिंक और आयरन जैसे खनिजों की कमी देखी गई है।

• अग्रवाल (2009): इन्होंने अपने शोध में पाया कि छोटे और सीमांत किसान जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि उनके पास नई तकनीक और सिंचाई के आधुनिक साधनों का अभाव है।

4. तकनीकी और नवाचार

• बर्न एवं अन्य (2010): इन्होंने तर्क दिया है कि आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसलें और 'स्मार्ट एग्रीकल्चर' ही भविष्य में बदलती जलवायु के बीच खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का एकमात्र विकल्प हो सकते हैं।

• भारत में क्षेत्रीय केस अध्ययन

सुंदरबन (पश्चिम बंगाल): समुद्र स्तर वृद्धि, लवणता और चक्रवातों से कृषि भूमि प्रभावित।

राजस्थान और शुष्क क्षेत्र: बढ़ती शुष्कता और पानी की कमी से रबी फसलों पर असर।

हिमालयी क्षेत्र: ग्लेशियर पिघलने और अनियमित वर्षा से पारंपरिक फसलें प्रभावित।

मध्य और दक्षिण भारत: मक्का और दालों में अस्थिरता अधिक।

5. पोषण सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

जलवायु परिवर्तन गुप्त भूख बढ़ा रहा है। फसलों में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से कुपोषण बढ़ता है। गरीबी, असमानता और प्रवासन बढ़ते हैं।

6. अनुकूलन और शमन रणनीतियां

अनुकूलन: जलवायु सहिष्णु फसल किस्में, कुशल जल प्रबंधन (टपक सिंचाई, वर्षा जल संचयन), फसल विविधीकरण, एग्रोफॉरेस्ट्री, सटीक कृषि और मौसम आधारित सलाह।

शमन: कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना, मिट्टी में कार्बन संग्रहण और सतत खाद्य प्रणालियां।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, पीएम-किसान और राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन को मजबूत करना चाहिए।

7. चर्चा और चुनौतियां

खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के बीच समझौता स्पष्ट है। अनुकूलन क्षमता सीमित होने से छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। संसाधन सीमा, शासन की कमी और ज्ञान का अभाव बड़ी चुनौतियां हैं।

8. निष्कर्ष

बदलती जलवायु खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। भारत को जलवायु सहिष्णु कृषि, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सामुदायिक भागीदारी पर जोर देना चाहिए। सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है। यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो भुखमरी, कुपोषण और सामाजिक अस्थिरता बढ़ेगी।

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