फसल विविधीकरण प्रोत्साहन: सरकारी योजनाओं का फसल प्रतिरूप पर प्रभाव

Author(s): मनमोहन मीना

Publication #: 2604039

Date of Publication: 17.11.2024

Country: India

Pages: 1-5

Published In: Volume 10 Issue 6 November-2024

Abstract

भारत में फसल विविधीकरण कृषि क्षेत्र की स्थिरता, किसानों की आय वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीति है। यह पारंपरिक मोनोकल्चर (एक फसल आधारित) प्रणाली से हटकर उच्च मूल्य वाली, जल-कुशल और पोषक फसलों की ओर संक्रमण को दर्शाता है। सरकारी योजनाएँ जैसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के अंतर्गत फसल विविधीकरण कार्यक्रम (CDP), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM), राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) ने फसल प्रतिरूप (cropping pattern) पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है।

ये योजनाएँ मुख्य रूप से हरित क्रांति वाले राज्यों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश) में धान जैसी जल-गहन फसलों से दलहन, तिलहन, मोटे अनाज और बागवानी फसलों की ओर क्षेत्र मोड़ने पर केंद्रित हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि इन योजनाओं ने मिट्टी की उर्वरता बहाली, जल संरक्षण और किसानों की आय में वृद्धि में योगदान दिया है, लेकिन चुनौतियाँ जैसे बाजार पहुंच की कमी, प्रोत्साहन की अपर्याप्तता और MSP की विकृति बनी हुई हैं। यह शोध पत्र फसल विविधीकरण के सैद्धांतिक आधार, प्रमुख योजनाओं, उनके प्रभावों, चुनौतियों और नीतिगत सिफारिशों का विश्लेषण करता है। डेटा PIB, आर्थिक सर्वेक्षण, शोध पत्रों और सरकारी रिपोर्टों पर आधारित है।

मुख्या शब्द :- फसल प्रतिरूप, विविधिकरण, मोनोकल्चर ,एम्. एस. पी.I

परिचय (Introduction):

भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो लगभग 45-50% जनसंख्या को रोजगार प्रदान करती है और GDP में करीब 18% योगदान देती है। हरित क्रांति (1960s) ने गेहूँ और धान के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि की, लेकिन इससे मोनोकल्चर प्रणाली मजबूत हुई, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी की उर्वरता ह्रास, जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन, कीट-रोगों का बढ़ना और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ उत्पन्न हुईं। फसल विविधीकरण इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है, जिसमें किसान पारंपरिक कम लाभकारी फसलों से हटकर अधिक लाभकारी, पोषक और पर्यावरण-अनुकूल फसलों (जैसे दलहन, तिलहन, मोटे अनाज, फल-सब्जियाँ) की ओर बढ़ते हैं।

फसल विविधीकरण को आमतौर पर दो रूपों में देखा जाता है: क्षैतिज विविधीकरण (क्षेत्र विस्तार) और लंबवत विविधीकरण (मूल्य संवर्धन और एकीकृत खेती)। भारत में यह आवश्यकता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन से अनियमित वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। सरकारी योजनाएँ इस संक्रमण को प्रोत्साहित करने में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। उदाहरणस्वरूप, CDP (2013-14 से) हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान क्षेत्र को वैकल्पिक फसलों की ओर मोड़ने का प्रयास कर रहा है।

इस शोध पत्र का उद्देश्य सरकारी योजनाओं का फसल प्रतिरूप पर प्रभाव विश्लेषित करना है। यह सैद्धांतिक ढांचा, प्रमुख योजनाओं का वर्णन, प्रभावों का मूल्यांकन (सकारात्मक और नकारात्मक), राज्य-स्तरीय उदाहरण, चुनौतियाँ और सिफारिशें प्रस्तुत करेगा। विश्लेषण द्वितीयक डेटा (PIB, आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25, शोध पत्र) पर आधारित है। फसल विविधीकरण न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करेगा बल्कि किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य (Doubling Farmers' Income) को भी समर्थन देगा।

साहित्य समीक्षा (Literature Review) :

फसल विविधीकरण पर व्यापक शोध उपलब्ध है। Hazra (FAO रिपोर्ट) के अनुसार, भारत में विविधीकरण कम लाभकारी फसलों से अधिक लाभकारी फसलों की ओर शिफ्ट है, जो सरकारी नीतियों, मूल्य समर्थन और विशेष कार्यक्रमों से प्रभावित होता है। Gupta et al. (2025, IGIDR WP) ने पंजाब और हरियाणा में CDP के प्रभाव का अध्ययन किया और पाया कि नकद प्रोत्साहन (पंजाब में ₹23,500/हेक्टेयर, हरियाणा में ₹17,300/हेक्टेयर) के बावजूद धान क्षेत्र से केवल 17-20% (पंजाब) और 11-16% (हरियाणा) क्षेत्र ही शिफ्ट हो पाया, जो लक्ष्य (30%) से कम है। मुख्य कारण MSP की विकृति और बाजार जोखिम हैं।

एक अन्य अध्ययन (IJFMR, 2025) में 1980-81 से 2023-24 तक फसल प्रतिरूप परिवर्तनों का विश्लेषण किया गया, जिसमें अनाज-केंद्रित प्रणाली से बागवानी, दलहन और तिलहन की ओर वृद्धि दिखाई गई। सरकारी पहल जैसे RKVY, NMSA और PMKSY ने इस परिवर्तन को गति दी। PIB (2026) रिपोर्ट के अनुसार, CDP के तहत 2013-14 से 2024-25 तक हरियाणा में 1.93 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वैकल्पिक फसल प्रदर्शन किए गए।

NMSA फोकस जल उपयोग दक्षता, मिट्टी स्वास्थ्य और आजीविका विविधीकरण पर है, जो एकीकृत खेती प्रणाली (crop-livestock, agroforestry) को बढ़ावा देता है। PMKSY (Per Drop More Crop) माइक्रो-इरिगेशन के माध्यम से फसल विविधीकरण को समर्थन देता है, जिससे ग्राउंडनट और बनाना जैसी फसलों में उपज वृद्धि दर्ज की गई (Frontiers in Sustainable Food Systems, 2026)।

राज्य-स्तरीय अध्ययनों में पंजाब में विविधीकरण चुनौतियाँ (नीतिगत पूर्वाग्रह MSP की ओर) लेकिन अवसर (मिट्टी स्वास्थ्य, जैव विविधता) उजागर हुए। कुल मिलाकर, साहित्य सकारात्मक प्रभावों (उपज वृद्धि, जल बचत, आय स्थिरता) के साथ चुनौतियों (कार्यान्वयन में कमी, बाजार पहुंच) को स्वीकार करता है। यह पत्र इन अंतरालों को भरते हुए समसामयिक डेटा (2024-25 तक) का उपयोग करता है।

फसल विविधीकरण के सैद्धांतिक और व्यावहारिक आधार

फसल विविधीकरण आर्थिक (जोखिम न्यूनीकरण, आय वृद्धि), पर्यावरणीय (मिट्टी संरक्षण, जल दक्षता) और सामाजिक (पोषण सुरक्षा, लचीलापन) आयामों पर आधारित है। सैद्धांतिक रूप से, यह Ricardian comparative advantage और portfolio theory से जुड़ा है, जहाँ किसान जोखिम को कम करने के लिए फसल पोर्टफोलियो विविधीकृत करते हैं।

व्यावहारिक रूप में, भारत में विविधीकरण को तीन स्तरों पर देखा जाता है:

क्षेत्रीय स्तर: राज्य-विशिष्ट फसल पैटर्न परिवर्तन (उदाहरण: पंजाब में धान से मक्का/दलहन)।

खेत स्तर: इंटरक्रॉपिंग, रोटेशन और मिश्रित खेती।

आर्थिक स्तर: उच्च मूल्य फसलों (horticulture) और मूल्य संवर्धन की ओर शिफ्ट।

सरकारी योजनाएँ इन आधारों को प्रोत्साहित करती हैं। उदाहरणस्वरूप, CDP मिट्टी की उर्वरता बहाली के लिए लेग्यूमिनस फसलों पर जोर देता है। PMKSY माइक्रो-इरिगेशन से जल-कुशल फसलों को बढ़ावा देता है, जिससे उपज में 30-40% वृद्धि और विविधीकरण संभव होता है।

फसल प्रतिरूप पर प्रभाव को मापने के लिए इंडिकेटर्स जैसे Simpson Diversity Index, cropping intensity, gross cropped area under non-cereals आदि उपयोग किए जाते हैं। 2018-19 से 2024-25 तक खाद्यान्न क्षेत्र में 127.72 लाख हेक्टेयर वृद्धि हुई, लेकिन horticulture उत्पादन 362.08 MT तक पहुँचा, जो विविधीकरण का संकेत है।

प्रमुख सरकारी योजनाएँ और उनके प्रावधान

फसल विविधीकरण कार्यक्रम (CDP) under PM-RKVY: 2013-14 से हरियाणा, पंजाब और UP में लागू। उद्देश्य: धान क्षेत्र को दलहन, तिलहन, मोटे अनाज (श्री अन्न), कपास आदि की ओर मोड़ना। प्रावधान: प्रदर्शन, यंत्रीकरण, मूल्य संवर्धन, प्रशिक्षण। 2026 PIB के अनुसार, राज्य सरकारों के माध्यम से मोटे अनाज और पोषक अनाज को बढ़ावा।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA): वर्षा आधारित क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने पर फोकस। आयाम: जल दक्षता, पोषक प्रबंधन, आजीविका विविधीकरण। प्रोत्साहन: एकीकृत खेती, क्रॉप-लिवेस्टॉक सिस्टम, एग्रोफॉरेस्ट्री।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY): "हर खेत को पानी, प्रति बूंद अधिक फसल"। Per Drop More Crop घटक माइक्रो-इरिगेशन को बढ़ावा देता है, जो विविधीकरण (उच्च मूल्य फसलें) को सक्षम बनाता है। अध्ययनों में ग्राउंडनट में 158 kg/ha और बनाना में 1560 kg/ha अतिरिक्त उपज दर्ज।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM): दलहन और मोटे अनाज पर फोकस। आट्मनिर्भरता मिशन ऑन पल्सेस और NMEO-Oilseeds भी विविधीकरण को समर्थन देते हैं।

मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH): फल, सब्जी, मसाले आदि पर। क्षेत्र विस्तार, पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट।

अन्य: Paramparagat Krishi Vikas Yojana (PKVY) जैविक खेती के माध्यम से विविधीकरण; RKVY राज्य-विशिष्ट लचीलापन प्रदान करता है। राज्य स्तर पर हरियाणा की 'मेरा पानी मेरी विरासत' (₹7000/एकड़ प्रोत्साहन) और बिहार/मध्य प्रदेश की योजनाएँ।

ये योजनाएँ केंद्रीय प्रायोजित हैं और राज्य सरकारों के माध्यम से लागू होती हैं, जिसमें सब्सिडी, प्रशिक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल है।

फसल प्रतिरूप पर प्रभाव: विश्लेषण और डेटा :

सरकारी योजनाओं ने फसल प्रतिरूप को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। 1980-2024 तक अनाज से हटकर फल-सब्जियों, दलहन और तिलहन की ओर वृद्धि हुई। आर्थिक सर्वेक्षण और MOSPI डेटा के अनुसार, फसल क्षेत्र का कुल मूल्य उत्पादन (GVO) में अनाजों का हिस्सा घटा जबकि फल-सब्जियों का बढ़ा (2011-12 से 2023-24 तक फल-सब्जी GVO ₹270 से ₹410 हजार करोड़)।

तालिका: CDP के तहत प्रदर्शन क्षेत्र और फसल प्रतिरूप में बदलाव (2018-19 से 2024-25)

वर्ष प्रदर्शन क्षेत्र (हेक्टेयर में) मुख्य फसलें (जिनमें शिफ्ट हुआ) प्रभाव / परिणाम

2018-19 40,593 दलहन, तिलहन, मक्का जल की बचत और मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार

2022-23 5,747 मोटे अनाज (Millets) किसानों की आय में वृद्धि

2023-24 14,019 पोषक अनाज (Nutri-Cereals) धान के क्षेत्र में कमी और पोषण सुरक्षा

2024-25 3,480 वैकल्पिक फसलें सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा (PIB डेटा)

कुल 1,86,546 - धान क्षेत्र से बड़े पैमाने पर विविधीकरण

डेटा का संक्षिप्त विश्लेषण:

1. धान से शिफ्ट: इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों में धान (चावल) की खेती को कम करना है जहाँ भू-जल स्तर गिर रहा है। तालिका दर्शाती है कि 2018 से 2025 के बीच कुल 1,86,546 हेक्टेयर क्षेत्र को धान से हटाकर अन्य फसलों की ओर मोड़ा गया है।

2. वैकल्पिक फसलें: किसानों ने धान के स्थान पर मुख्य रूप से दलहन (दालें), तिलहन, मक्का और मोटे अनाजों को अपनाया है।

3. प्रमुख लाभ:

o जल संरक्षण: धान की तुलना में इन फसलों को बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है।

o मिट्टी की उर्वरता: दलहन जैसी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद करती हैं।

o आय में वृद्धि: वैकल्पिक और पोषक अनाज बाजार में बेहतर मूल्य प्रदान कर रहे हैं।

यह डेटा स्पष्ट करता है कि सरकार की रणनीतियों के कारण फसल प्रतिरूप (Cropping Pattern) में सकारात्मक बदलाव आ रहा है।

सकारात्मक प्रभाव:

जल संरक्षण और मिट्टी स्वास्थ्य: CDP और PMKSY से पंजाब-हरियाणा में धान क्षेत्र से शिफ्ट, जिससे जल बचत और लेग्यूमिनस फसलों से नाइट्रोजन फिक्सेशन।

उपज और आय वृद्धि: PMKSY beneficiaries में उच्च उपज; विविधीकृत किसानों में लाभ अधिक (IMPRI अध्ययन)।

क्षेत्र विस्तार: 2018-19 से 2024-25 तक खाद्यान्न क्षेत्र वृद्धि, लेकिन horticulture 362 MT। NFSM से दलहन उत्पादन बढ़ा।

राज्य उदाहरण: हरियाणा में CDP से 1.93 लाख हेक्टेयर प्रदर्शन; पंजाब में मक्का/दलहन की ओर धीमी लेकिन दृश्यमान शिफ्ट।

नकारात्मक/सीमित प्रभाव:

MSP और प्रोक्योरमेंट नीतियाँ धान-गेहूँ को प्राथमिकता देती हैं, जिससे विविधीकरण बाधित

प्रोत्साहन अपर्याप्त: वर्तमान नकद सहायता लक्ष्य क्षेत्र शिफ्ट (30%) हासिल नहीं कर पाई।

असमान वितरण: छोटे किसानों तक पहुंच कम; बुनियादी ढांचा (कोल्ड स्टोरेज, बाजार) की कमी।

कुल मिलाकर, योजनाओं ने cropping intensity बढ़ाई (144% से 154%) और irrigated area को 49% से 55% तक, लेकिन पूर्ण विविधीकरण अभी चुनौती है।

चुनौतियाँ और बाधाएँ (Challenges and Barriers)

नीतिगत विकृति: MSP मुख्य रूप से गेहूँ-धान पर प्रभावी, अन्य फसलों पर कम।

बाजार और इंफ्रास्ट्रक्चर: मूल्य अस्थिरता, भंडारण की कमी, प्रोसेसिंग इकाइयों का अभाव।

कार्यान्वयन मुद्दे: देरी, जागरूकता की कमी, छोटे किसानों के लिए उच्च प्रारंभिक लागत।

जलवायु और जोखिम: अनिश्चित मौसम, कीट हमले (पंजाब में कुछ मामलों में नुकसान)।

डेटा और मूल्यांकन: राज्य-स्तरीय असमानता; प्रभाव मापन में कमी।

निष्कर्ष और सिफारिशें (Conclusion and Recommendations)

सरकारी योजनाओं ने फसल प्रतिरूप को विविधीकृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे स्थिरता, आय और पर्यावरण संरक्षण में योगदान मिला। फिर भी, MSP सुधार, बाजार लिंकेज मजबूत करना, प्रोत्साहन बढ़ाना और डिजिटल/प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जरूरत है।

सिफारिशें:

MSP को अधिक फसलों पर प्रभावी बनाना।

FPOs और स्टार्टअप्स के माध्यम से मूल्य श्रृंखला विकास।

जलवायु-स्मार्ट विविधीकरण पर फोकस (NMSA को मजबूत करना)।

राज्य-विशिष्ट मॉडल और बेहतर मॉनिटरिंग।

फसल विविधीकरण भारत की कृषि को सतत और लाभकारी बनाने की कुंजी है। निरंतर नीतिगत समर्थन से यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

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