प्राचीन भारतीय संस्कृति में यक्ष परम्परा: एक ऐतिहासिक अध्ययन
Author(s): Dr. Richa Pathak
Publication #: 2610016
Date of Publication: 05.03.2022
Country: India
Pages: 1-6
Published In: Volume 8 Issue 2 March-2022
DOI: https://doi.org/10.62970/IJIRCT.v8.i2.2610016
Abstract
प्राचीन भारतीय संस्कृति में यक्ष परम्परा का उद्भव और विकास प्रकृति-पूजा, जन-मान्यता और लोक-आस्था से जुड़ा रहा है। [1, 2]
यक्ष परम्परा का स्वरूप और इतिहास
• प्रकृति के रक्षक: प्रारंभिक वैदिक और पूर्व-वैदिक काल में यक्षों को वन, जल, पर्वत, वृक्ष और भूमि में छिपी शक्तियों या प्रकृति-आत्माओं के रूप में माना जाता था। [1, 2]
• उत्पत्ति की कथा: रामायण के अनुसार, प्रजापति ने जल की रक्षा के लिए कुछ प्राणियों को उत्पन्न किया और 'रक्षध्वम्' (रक्षा करो) कहा। इनमें जो 'रक्षाम:' बोले वे राक्षस कहलाए और जो 'यक्षाम:' (पूजा या सेवा करेंगे) बोले, वे यक्ष के रूप में जाने गए। [1]
• धन और समृद्धि के प्रतीक: हिंदू धर्म में यक्षों के राजा कुबेर को माना गया है, जो धन, समृद्धि और उत्तर दिशा के रक्षक हैं। [1, 2]
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