1991 के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधारा में अंतर होने के बावजूद आर्थिक नीतियों में आई निरंतरता का अध्ययन
Author(s): डॉ अशोक कुमार मीना
Publication #: 2608012
Date of Publication: 13.01.2025
Country: India
Pages: 1-10
Published In: Volume 11 Issue 1 January-2025
Abstract
वर्ष 1991 भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास में एक युगांतरकारी मोड़ सिद्ध हुआ। गंभीर भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis) के जवाब में आरंभ किए गए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के मूलभूत ढांचे को बदल दिया। इस शोध पत्र का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि वर्ष 1991 के पश्चात् भारत में दक्षिणपंथी, वामपंथी, मध्यमार्गी और क्षेत्रीय - विभिन्न परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले राजनीतिक दलों की सरकारों के गठन के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक नीतियों में एक उल्लेखनीय और अभूतपूर्व निरंतरता क्यों और कैसे बनी रही।
यह पत्र कांग्रेस नीत नरसिम्हा राव सरकार (1991–1996), संयुक्त मोर्चा की सरकारों (1996–1998), अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार (1998–2004), मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार (2004–2014) तथा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार (2014 से वर्तमान) के आर्थिक निर्णयों का तुलनात्मक और संस्थागत विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि वैश्वीकरण का बाह्य दबाव, तकनीकी प्रगति, वित्तीय घाटे का नियंत्रण, नौकरशाही की निरंतरता, जनसांख्यिकीय मांगें और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (IMF, World Bank, WTO) की शर्तें ऐसे मुख्य कारक रहे हैं जिन्होंने वैचारिक मतभेदों को गौण कर दिया। यद्यपि चुनावी भाषणों और घोषणापत्रों में उग्र वैचारिक विरोध दिखाई देता है, परंतु सत्ता में आने पर सभी दल 'नव-उदारवादी आर्थिक आम सहमति' (Post-1991 Economic Consensus) का पालन करते हैं। यह शोध पत्र इस निरंतरता के सामाजिक-राजनीतिक परिणामों, क्रमिक सुधार मॉडल (Incremental Reforms) और भारतीय लोकतंत्र पर इसके प्रभाव का आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है।
Keywords: आर्थिक सुधार 1991, राजनीतिक विचारधारा, उदारीकरण, वैश्वीकरण, नीतिगत निरंतरता, नव-उदारवाद, गठबंधन राजनीति, वाशिंगटन सर्वसम्मति।
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