नई वाली हिंदी: हिंदी साहित्य में सीमाएं और संभावनाएं

Author(s): Dr. Jyotsana Swarnkar

Publication #: 2607005

Date of Publication: 08.07.2026

Country: India

Pages: 1-6

Published In: Volume 12 Issue 4 July-2026

DOI: https://doi.org/10.62970/IJIRCT.v12.i4.2607005

Abstract

प्रस्तुत शोधपत्र 'नई वाली हिंदी' की अवधारणा का हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करता है। पिछले एक दशक में हिंदी प्रकाशन जगत में 'नई वाली हिंदी' एक चर्चित शब्द के रूप में उभरी है, जिसने साहित्यिक हलकों में व्यापक बहस को जन्म दिया है। यह शोधपत्र 'नई वाली हिंदी' की परिभाषा, उसकी विशेषताओं, पारंपरिक हिंदी साहित्य से भिन्नता, तथा इससे जुड़ी सीमाओं और संभावनाओं का गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है। शोध में पाया गया कि 'नई वाली हिंदी' भाषा की बदलती प्रकृति, डिजिटल युग की आवश्यकताओं, और युवा पाठक वर्ग की रुचियों का प्रतिबिंब है। यद्यपि इस पर भाषा की शुद्धता को लेकर आलोचनाएं हुई हैं, तथापि इसने हिंदी साहित्य को नए पाठकों तक पहुंचाने और उसे समकालीन वास्तविकताओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शोध निष्कर्ष बताते हैं कि 'नई वाली हिंदी' हिंदी साहित्य के विकास की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसमें अपार संभावनाएं हैं, बशर्ते इसकी सीमाओं को पहचान कर उनका समाधान किया जाए।

Keywords: नई वाली हिंदी, हिंदी साहित्य, समकालीन हिंदी, भाषा परिवर्तन, डिजिटल साहित्य, युवा पाठक, प्रकाशन जगत, भाषा शुद्धता, साहित्यिक आलोचना, हिंदी की संभावनाएं

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